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Abstract

आज हमारे समाज में वृद्ध लोगों को दोयम दर्जे के व्यवहार का सामना करना पड़ रहा है। देश में तेजी से सामाजिक परिवर्तनों का दौर चालू है और इस कारण वृद्धों की समस्याएं विकराल रूप धारण कर रही हैं। प्रौद्योगिकी और आधुनिकीकरण के आगमन के साथए मृत्यु दर में कमीए जागरूकता में वृद्धिए पोषणए स्वास्थ्य देखभाल सुविधाओं में उन्नति और जीवन प्रत्याशा में वृद्धि हुई है। इस शोध का मुख्य उद्देश्य भारत में वृद्ध लोगों की समस्याओं की समझ हासिल करना है। जब व्यक्ति वृद्धावस्था में पहुंचते हैंए तो उन्हें जिन विभिन्न समस्याओं का सामना करना पड़ता हैए उनमें स्वास्थ्य की स्थिति में गिरावटए सेवानिवृत्तिए वित्तीय समस्याएंए अकेलापन और दूसरों पर निर्भरता शामिल हैं। 21वीं सदी में वृद्धों की संख्या में अभूतपूर्व वृद्धि होने की संभावना है। विकसित राष्ट्रों में स्वास्थ्य एवं समुचित चिकित्सीय सुविधा के चलते व्यक्ति अधिक वर्षों तक जीवित रहते हैं अतरू वृद्धों की जनसंख्या विकासशील राष्ट्रों से ज्यादा विकसित राष्ट्रों में ज्यादा है। भारतीय संस्कृति में वृद्धों को अत्यंत उच्च एवं आदर्श स्थान प्राप्त है। श्रवण कुमार ने अपने वृद्ध माता.पिता को कंधे पर बिठाकर संपूर्ण तीर्थयात्रा करवाई थीं। आज भी अधिकांश परिवारों में वृद्धों को ही परिवार का मुखिया माना जाता है। आज के वैश्विक समाज में वृद्धों को अनुत्पादकए दूसरों पर आश्रितए सामाजिक स्वतंत्रता से दूर अपने परिवार एवं आश्रितों से उपेक्षित एवं युवा लोगों पर भार की दृष्टि से देखा जाता है। जब तक हम वृद्धजनों की कीमत नहीं समझेंगेए उस उम्र की पीड़ा का अहसास नहीं करेंगेए तब तक हमारी सारी अच्छाइयां बनावटी होंगी।

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