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Abstract

प्राचीन काल से ल्¨कर वर्तमान काल तक की महिलायें पारिवारिक हिंसा की शिकार ह¨ती रही है। महिलाअ¨ं के विरूद्ध हिंसा आज हर देश में व्याप्त है। पूरब का समाज ह¨ या पश्चिम का समाज द¨न¨ं की प्रकृति अलग होने के बावजूद महिलाअ¨ं के खिलाफ हिंसा में लगभग समानता देखने क¨ मिल जाती है। पारिवारिक हिंसा प्राचीन काल से ही महिलाअ¨ं के विरूद्ध चली आ रही है।  भारत में सती प्रथा के नाम पर अ©रत¨ं क¨ चिता पर जलने के लिए मजबूर किया जाता रहा है।  भारत के पुरुषवादी स¨च में बहुत ज्यादा परिवर्तन नहीं आया है जिसके कारण घरेलू हिंसा भी हमारे समाज में उसी तरह व्याप्त है जैसे पहल्¨ था। वर्तमान में घरेलू हिंसा अपने हिंसक रूप में महिलाअ¨ं की स्वतंत्र्ाता का मजाक बना रहा है। वर्तमान समय में नारी पर अत्याचार, निःसंदेह एक बहुत ही मर्म स्पर्शी तथा शर्मनाक मुद्दा है। महिलाअ¨ं के प्रति हिंसा महज उसके शरीर पर घात नहीं बल्कि उसके अस्तित्व पर ही प्रश्नचिह्न है। आजकल के प्रचार माध्यम¨ं में महिलाअ¨ं क¨ महज भ¨ग  विलास की वस्तु बना दिया है, इस कारण समाज में महिलाअ¨ं के प्रति स¨च बिगड़ती जा रही है अ©र आए दिन य©न हिंसा का रूप देखने क¨ मिलता है।

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