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Abstract

गोस्वामी तुलसीदास की अद्भुत कविता एवं अन्यान्य महत्ता में उनकी तपस्या ही हेतु है। इसमें तुलसीदास रामचरितमानस ही साक्षी है। ‘तपः स्वाध्यायनिरतं तपस्वी वाग्विदां वरम्’ से इस काव्य का ‘तप’ षब्द से ही आरम्भ होता है और प्रथम अर्धाली में ही दो बार ‘तप’ षब्द आया और ‘तपस्वी’ षब्द द्वारा गोस्वामी ने एक प्रकार से अपनी जीवनी भी लिख दी। तप द्वारा ही ब्रह्मा जी का उन्होंने साक्षात् किया, रामचरितमानस की दिव्यकाव्यता का आषीर्वाद लिया और रामचरित्र का दर्षन किया। बाद में विष्वामित्र के विचित्र तप का वर्णन, गंगा जी के भगीरथ की अद्भुत तपस्या, चूली ऋशि की तपस्या, भृगु की तपस्या आदि का भी वर्णन है।

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