Main Article Content

Abstract

उपन्यास आधुनिक औद्योगिक युग की उपज है, इसीलिए वह साहित्य की अन्य विधाओं से पूर्ण रूप से विभिन्न है। उपन्यास का मूल आधार यथार्थवाद है। साहित्य की तमाम विधाएं कल्पना और रोमानी दृष्टिकोण के आधार पर लोकप्रिय हो सकती है, परंतु यथार्थ के अभाव में उपन्यास का भवन ढह जाता है। उपन्यास वहां से प्रारंभ होता है, जहां से महाकाव्यों का संसार समाप्त होता है। महाकाव्य में एक आदर्शवाद की स्थापना की जाती है वहां सारे जीवन मूल्य और मर्यादा ए उनका मूलाधार होती हैं । सामाजिक संबंध भी लगभग स्थिर होते हैं उसका कोई अतिक्रमण नहीं कर सकता।इस प्रकार उपन्यास विधा अन्य विधाओं से सशक्त विधा मानी जा सकती है । उपन्यास विधा में किसानी जीवन का उल्लेख बहुत अच्छे तरीके से किया गया है। उपन्यास पंजाबी हो  अथवा हिंदी कृषक जीवन का उल्लेख करने में पूर्ण संपन्न रहे हैं। हिंदी में किसान के भूमिहीन बनने की प्रक्रिया का उद्घाटन की प्रक्रिया अनेक उपन्यासों में किया जा चुका है। हिंदी के प्रसिद्ध नाटककार व उपन्यासकार जगदीश चंद्र माथुर के अनेक उपन्यास कृषक जीवन की स्थिति को प्रकट करते हैं और मुंशी प्रेमचंद  ने भी कृषक जीवन की समस्याएं सामने लाने के लिए अनेक उपन्यासों की रचना की, जिसमें से गोदान एक प्रसिद्ध उपन्यास है। इस प्रकार  ग्रामीण  जीवन पर लिखे उपन्यास का केंद्र बिंदु अधिकांश रूप में भारतीय किसान ही हैं वैसे विभिन्न कोनों से देहात की सभी  मुख्य समस्याएं अनेक उपन्यासों में समाहित होती हैं और किसान  के भूमिहीन मजदूर बनने की प्रक्रिया का विस्तृत एवं सूक्ष्म अंकन होता है। इस प्रकार पहले हिंदी   उपन्यासों में कृषक जीवन की स्थिति का अनुभव करते हैं

Article Details