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Abstract

भारत में समावेशी विकास की अवधारणा प्राचीन समय से विद्यमान है। 12वीं पंचवर्षीया योजना ;2012.17द्ध में समावेशी शिक्षा द्वारा सामाजिक विकास के लक्ष्य को प्राप्त करने पर जोर दिया गया। शिक्षा का समावेशीकरण यह बताता है कि विशेष शैक्षणिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए एक सामान्य छात्र और एक दिव्यांग छात्र को समान शिक्षा प्राप्ति के अवसर मिलने चाहिये। भारतीय ऐतिहासिक परिपेक्ष्य में कोठारी आयोग ;1964.66द्धए राष्ट्रीय शिक्षा नीति ;1986द्धए निषक्त व्यक्ति अधिनियम ;1995द्धए राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा ;2005द्ध इत्यादि में समावेशन की नीति को स्वीकार किया गया है। लोकसभा ने 16 दिसम्बरए 2016 को ष्ज्ीम त्पहीजे व िच्मतेवदे ूपजी क्पेंइपसपजपमे ठपसस 2016ष् पास किया। समावेशी शिक्षा समाज के सभी बच्चो को शिक्षा की मुख्य धारा से जोड़ने का प्रयास करती है। अतरू समावेशी शिक्षा की अवधारणा पर पुर्नविचार कर उपलब्ध संसाधनो के परिपेक्ष्य में समावेशी विकास हेतु इसकी भूमिका पर ध्यान देना आज की आवश्यकता है। किन्तु वस्तुतरू इतने प्रयासों के बाद भी आज भी हमारे विद्यालयों के पास पर्याप्त संसाधन नहीं है और न ही प्रशिक्षित अध्यापक जिससे की दिव्यांग अथवा विशेष आवश्यकता वाले बच्चों की शिक्षा का समुचित प्रबन्ध किया जा सके। आज आवश्यकता है कि समाज में समावेशी शिक्षा समावेशी विकास के प्रति जागरूकताए चेतनाए संवेदना जागृत की जाये इस दिशा में समाज के सभी वर्गोए संस्थानोंए संगठनों को कार्य करना अति आवश्यक है। समावेशी विकास वैष्विक स्पर्द्ध के युग में आवश्यकता ही नही अनिर्वायता है जिसकी दिशा में समावेशी शिक्षा एक सार्थक एवं महत्वपूर्ण पहल है।

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