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Abstract

गांधी की अहिंसा की अवधारणा राष्ट्रीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर एक व्यापक रूप में अस्तित्व में कार्य कर रही है। उनके अनुसारए अहिंसा एक ऐसा अचूक सिद्धान्त है जिसके आधार पर सहज ही बड़ी से बड़ी समस्याओं का निराकरण संभव है। इसके माध्यम से समय के साथ उठने वाली समस्याओं का अनुपम समाधान किया जा सकता है। इसके लिए आत्मबल परम आवश्यक है। गांधी ने अहिंसा को मात्र दर्शन ही नहीं माना बल्कि सार्थक कार्य करने की ऐसी सकारात्मक पद्धति है जिसके द्वारा सामाजिक शांति और समरसता को स्थापित किया जा सकता है। इसका प्रादुर्भाव भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में सहज ही आंका जा सकता है। गांधी ने सक्रिय अहिंसा का परिचय देते हुए भारत को विश्व मानचित्र पर एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में अंकित करने में अहम् भूमिका निभाईए जिसके फलस्वरूप गांधी जी भारत में ही नहीं बल्कि अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर शांति के अग्रदूत के रूप में जाने जाते हैं। गांधी के सिद्धान्तों और विचारों की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह रही है कि उन्होंने मानव व्यवहार को सर्वोपरि स्थान दिया है। उनके अनुसारए व्यक्ति अपने व्यवहार से विपरीत परिस्थितियों को भी अपने अनुकुल बना सकता हैए यदि वह सद्मार्ग और अहिंसा के मार्ग का चयन करता है। अहिंसा हथियारों से भी अधिक सशक्त औजार हैए यह मानवता के लिए एक महानतम शक्ति है। वर्तमान समय में जिस गति से वैश्विक स्तर पर बदलाव और आधुनिकता के साथ.साथ राष्ट्रों द्वारा स्वयं को और अधिक प्रबल रूप में स्थापित करने के लिए शस्त्रीकरण की चकाचौंध में मानवीय मूल्यों और विश्व शांति का ह्रास हो रहा हैए इससे व्यक्ति और समाज तो विकास की ओर अग्रसर हो रहे हैंए लेकिन अपने अस्तित्व को शस्त्रों की नींव पर लाकर खड़ा कर दिया हैए जिसके दूरगामी परिणाम भविष्य में साकारात्मक रूप में स्थापित नहीं हो सकतेए इसलिए सत्य और अहिंसा के माध्यम से संरक्षित रहने के अतिरिक्त हमारे पास और कोई विकल्प नहीं है। गांधी जी के शब्दों में अमानवीय ढंग से अर्जित की गई प्रबल स्वतंत्रता और विकास मानवीय हित में नहीं है। इसलिए वैश्विक स्तर पर शांति और समरसता को बनाए रखने के लिए गांधी जी के विचारों और सिद्धांतों की ओर पुनः लौटना होगाए तभी अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर वैमनस्य से दूर रहकर एक आदर्श विश्व की स्थापना सम्भव हो पाएगी। इसके लिए सभी राष्ट्रों को अपने स्वार्थो से दूर जाकर सामूहिक स्तर पर ऐसे कार्य करने होंगेंए जिससे एक शस्त्र रहित विश्व का गठन करना होगाए जिसमें सभी राष्ट्रों के हितों का समान रूप से सम्मान किया जाएगा और नैतिकता तथा अहिंसा को व्यापक स्तर पर विश्व में लागू करना होगा। तभी व्यवहारिक रूप में गांधी दर्शन एक विश्वशांति के रूप में प्रासंगिक सिद्ध होगा। सैनिक श्रेष्ठता प्राप्त करने और शक्ति संतुलन के भ्रम में रहने वाले अन्तर्राष्ट्रीय राजनीतिज्ञों के लिए गांधी शायद प्रांसगिक ना होंए लेकिन तृतीय विश्वयुद्ध की आशंका में सांस लेती मानवता के लिए वर्तमान में गांधी जी की विचारधारा और दर्शन पूर्ण रूप से प्रासंगिक है।

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