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Abstract

दुनिया के अन्य देशों की तरह भारत में भी महिलाओं को अनेकों प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। यहाँ प्रत्येक वर्ग की महिलाओं की स्थिति ऐसी पितृसत्तात्मक व्यवस्था के अधीन रहती है जिसमें पुरुषों का स्त्रियों पर वर्चस्व रहता है। अतः वे उनका शोषण व उत्पीड़न कर सकते हैं जिसे इस व्यवस्था के अंतर्गत वैधता भी मिल जाती हैं। पितृसत्ता को एक व्यवस्था के रूप में देखना बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें पुरुष व स्त्री के मध्य शक्ति एवं हैसियत में असमानता के लिए जैविक निर्धारण बाद के मत को खारिज करने में सहायता मिलती है साथ ही यह भी स्पष्ट होता है कि स्त्री पर पुरुष का वर्चस्व कोई आकस्मिक घटना नहीं है बल्कि एक व्यापक सामाजिक संरचना का अंग हैए एक सोची.समझी सामाजिक.सांस्कृतिक प्रतिस्थापना है। इसका अभिप्राय यह है कि स्त्रियों को शक्तिहीन मानकर सभी प्रकार के अधिकारोंए संसाधनों एवं सशक्त प्रभावों से वंचित रखा जाता है।1 स्त्री वर्ग की मौजूदा अधीनस्थता अपरिवर्तनीय जैविक असमानताओं से नहीं पैदा होती हैं बल्कि ऐसे सामाजिक.सांस्कृतिक मूल्योंए विचारधाराओंए संस्थाओं की देन है जो स्त्रियों की वैचारिक एवं भौतिक अधीनता को सुनिश्चित करती हैं।2 यह व्यवस्था बहुत सोच समझकर बनाई गई हैए ऐसा इसलिए कहा जा सकता है कि मानव समाज के आरंभिक दौर में किसी प्रकार का कोई लिंग विभाजन नहीं था। उस समय सामाजिक व्यवस्था समानता के सिद्धांत पर चलती थी परंतु मानव सभ्यता के विकास के साथ.साथ भारतीय समाज में पितृसत्तात्मक व्यवस्था की जड़े गहरी होती चली गई और आज भी संपूर्ण भारतीय समाज इस पितृसत्तात्मक व्यवस्था एवं सोच से बुरी तरह से जकड़ा हुआ है। जिसके कारण महिलाओं को अपने विकास में विभिन्न प्रकार की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।

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