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Abstract

तृतीय लिंगी समाज ऐसे व्यक्तियों का एक समूह जो कि न तो पूर्णतरू स्त्री हैं और न ही पुरुषप् जिनका अस्तित्व उतना ही पुराना है जितना कि हमारा और आपकाप् किंतु इनके वजूद को पूर्णतरू नकारा गया हैप् इनके अस्तित्व को स्वीकार करने में हमें एक लम्बे समय अंतराल से गुजरना पडा हैप् किंतु ऐसा नहीं था कि इनकी उपस्थिति हमारे बीच नहीं रही होए इतिहास इस बात का जीता.जागता उदाहरण हैप् अगर बात करें पुराणों और धार्मिक ग्रंथों की तो रामायण में हमें इनके अस्तित्व का प्रमाण मिल जाता हैप् जहाँ भगवान राम ने इन्हें इनकी आज्ञापालनार्थ गुण की वजह से अपना आशीर्वाद प्रदान कियाप् तदुपरांत महाभारत में भी हमें इनका उल्लेख प्राप्त होता है जहाँ धनुर्धारी अर्जुन ने एक वर्ष तक वृहन्नला के रूप में जीवन व्यतीत किया थाए जिसे न तो पूर्णतरू स्त्री माना गया और न ही पूर्णतरू पुरुषप् शिखण्डी भी महाभारत की एक पात्र है जिसे तृतीयलिंगी के रूप में ही स्वीकार किया जाता हैप् हमारे मध्यकालीन भारतीय इतिहास के दिल्ली सल्तनत के शासक अलाउद्दीन खिलजी के बारे में भी ऐसा कहा जाता है कि उसने मलिक काफूर नामक व्यक्ति को दास के रूप में पाया थाए जो तृतीय लिंगी था और कई गुणों से परिपूर्ण थाप् मुगल सल्तनत में भी तृतीय लिंगी समुदाय का पर्याप्त उल्लेख मिल जाता है जहाँ अकबर ने इन्हें महल की स्त्रियों की सुरक्षा के लिये नियुक्त किया थाए जिसे हम हरम दल के रूप में जानते हैंप् इस प्रकार तृतीय लिंगी समाज का इतिहास स्त्री और पुरुष के समानांतर चलता चला आया है किंतु किसी ने भी इनके अस्तित्व को उजागर करने का साहस नहीं जुटायाप् हिन्दी साहित्य में तो इनके अस्तित्व का जिक्र ही नहीं किया गयाप् अगर किया भी गया होगा तो वह न के बराबर होगा जिसे शायद ही कोई जानता हो

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