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Abstract

प्रेमचंदोत्तर उपन्यासकारों में रवींद्र वर्माजी का स्थान महत्वपूर्ण है । हिंदी साहित्य में श्री रवींद्र वर्माजी ने अपनी रचनाओं में मानव की यथार्थ विसंगतियों के बारे में लिखा है । उन्होंने मनुष्य के भीतर और बाहर के दोनों पहलुओं को चित्रित करने में सफल रहे हैं । इनके साहित्य में समाज में दिखाई देनेवाली समस्याओं का यथार्थ चित्रण देखने को मिलता है । मनुष्य के मानसिक परिस्थितियों से जुडी भावनाओं को अत्यंत सूक्ष्मता से परिभाषित करने मॆं वर्माजी ने कोई कसर नहीं छोडी है । मनुष्य के जीवन में कई ऐसी परिस्थितियाँ आती हैं जहाँ पर निर्णय लेने में दुविधा या द्वंद्व की स्थिति होती है । कुछ अंतर्द्वंद्व मनुष्य के भीतर ही लुप्त या छिपि रह जाती है । व्यक्ति के अंतर्मन के द्वंद्व तथा मनोविकारों से ग्रस्त पात्रों के आचरण का सूक्ष्म विश्लेषण रवींद्रनाथजी के साहित्य लेखन का प्रधान लक्ष्य रहा है । मनोवैज्ञानिक विषयों पर आधारित साहित्य का लक्ष्य व्यक्ति का सामान्य चित्र प्रस्तुत करना ही नहीं बल्कि उसकी अनुभूतियों के सतत परिवर्तन और आत्मनिष्ठ संवेगों को परिवेशए परिस्थितियों और घटनाओं के संदर्भ मॆं प्रस्तुत करना होता है अर्थात मनोवैज्ञानिक कथासाहित्य में पात्रों के माध्यम से मनुष्य की मात्र बाह्य ही नहींए आत्मनिष्ठ विशेषताओं संवेदनाओं का चित्र भी खींचा जाता है ।

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