Main Article Content

Abstract

वैसे तो हिन्दी के साथ.साथ क्षेत्रीय भाषाओं में भी आदिवासी रचनाकार अपनी रचनाएँ प्रकाशित करवा रहे हैं लेकिन हिन्दी में उनकी रचनाएँ विशेष पहचान बनाने लगी हैं। आदिवासी साहित्य की वाचिक परम्परा तो बहुत पुरानी है जिसे ऑरेचर कहते हैं। आदिवासी यह मानते हैं कि सिर्फ शब्दों में निहित कल्पनाए अनुभवए भाव.विचार और यथार्थ की कलात्मक स्वानुभूति अथवा सहानुभूति की अभिव्यक्ति नहीं है बल्कि यह मानव सहित समस्त जीव जगत प्रकृति और समष्टि का जीवंत परफारमेंस है जो अध्यात्मिक अनुष्ठानोंए दैनदिन क्रिया कलापों और विविध कलात्मक अभिरूचियों व अभिव्यक्ति से भिन्न.भिन्न रूपों के द्वारा निरन्तर प्रदर्शित होता रहता है।

Article Details