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Abstract

सांख्य दर्शन भारतीय दर्शन में अत्यंत प्राचीनतम दर्शन हैं । इस दर्शन के प्रणेता महर्षि कपिल हैं ।  श्भागवत पुराण तथा गरुण पुराण में कपिल को भगवान विष्णु का पाँचवाँ अवतार कहा गया है । भारतीय दर्शनों में सांख्य दर्शन अत्याधिक ज्ञानवर्धक एवं प्रभावशाली है । इस संबंध में यह उक्ति प्रसिद्ध है दृ श्नास्ति सांख्य समं ज्ञानंश् अर्थात सांख्य के समान और कोई ज्ञान नहीं है द्य सांख्य का एक नाम सम्यक ज्ञान भी है द्य इस परिप्रेक्ष्य में डॉ० दीनानाथ पाण्डेय जी का मत है . श्सांख्य का अर्थ सम्यक ज्ञान है जो सांख्यकारिका से प्रमाणित है. साम्याज्ञानाधिगमात्ण्ण्ण्ण्ण्;का०६७द्ध । अब यदि कोई यह प्रश्न करें कि किसका सम्यक ज्ञान घ् तो इसका उत्तर है दृ तत्वों का सम्यक ज्ञान एवं तत्वाभ्यासाद ;का ६४द्ध । तत्व क्या है घ् इसका उत्तर कारिकाकार देते हैं दृ व्यक्ताव्यक्तज्ञविज्ञानात् ;का०२द्ध । इसप्रकार सांख्य का अर्थ ष्व्यक्तष्ए ष्अव्यक्तष् तथा ष्ज्ञष् का साम्यक् ज्ञान है द्य इसे ही तत्वज्ञान कहा जाता है । इन्हीं तत्वों के साम्यक् ज्ञान से विशुद्ध ज्ञान की उत्पत्ति होती है और उस विशुद्ध ज्ञान से श्कैवल्यश् प्राप्त होता है । इसीलिए सांख्य को मूलतः ष्व्यक्ताव्यक्तज्ञविज्ञानवादीष् कहा जाता है द्य व्यक्तए अव्यक्त और ज्ञ के स्वरूप को स्पष्ट किया जाएगा । इस प्रकार सांख्य कोई विशिष्ट संप्रदाय नहीं हैं आपितु दुःख त्रय से सदा के लिए छुटकारा दिलाने वाला साधन उपाय है और परमर्षि कपिल इस ;सांख्यज्ञानद्ध के द्रष्टा हैं

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