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Abstract

प्राचीन साहित्य में संत तथा भक्त दोनों शब्द समानार्थक माने गए हैं। किन्तु जब से पाश्चात्य समालोचकों ने भारतीय साहित्य की आलोचना करना प्रारम्भ किया है तब से संत शब्द उन साधकों के लिए प्रयोग होने लगा है जो परमात्मा को निगुर्ण व सगुण मानकर उसकी उपासना करते हैं। धीरे-धीरे इन संतों का आचार-विचार दर्शन ’सन्त मत’ कहलाने लगा जो आज भी विद्यमान है। जब हम सम्पूर्ण भारत में व्याप्त संतमत की बात करते हैं तब सर्व प्रथम संत प्रवर नामदेव, त्रिलोचन, बैणी आदि का नाम सामने आता है किन्तु ये वे संत नही हैं जिनके कारण संतमत संतमत कहलाया। वस्तुत संतमत को एक सिद्धान्त के रूप में स्थापित करने वालों में संत सम्राट कबीर का नाम सर्वोपरि व अन्यतम है। इसके पश्चात इस मत की ध्वजा को गुरू नानकदेव ने पंजाब में और दादुदयाल ने राजस्थान के घर-घर में फहराई। इन दोनों ही महापुरूषों का लगाया पौधा आज वटवृक्ष के रूप में फलता-फूलता सम्पूर्ण विश्व में दिख रहा है। संत श्री दादुदयाल के पंथ के समकक्ष ही राजस्थान में निरंजनी, रामस्नेही, गूदड़पंथी, चरणदासी आदि कई सम्प्रदाय और संतमतानुसार प्रादुर्भाव जिनका  जनसमाज पर आज भी व्यापक प्रभाव है।

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