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Abstract

सामाजिक संस्तुति सामाजिक स्वीकृति से है जो समाज स्वीकृत मानकों या आचरण के आदर्शों के अनुसार प्राप्त की जाती है। यदि कोई नैतिक मानक न हो तो किसी के आचरण को नैतिक-अनैतिक कहना निराधार ही होगा। परन्तु नैतिक-अनैतिक आचरण का मल्ूयांकन समाज मंे ही हो सकता है। समाज मंे ही व्यक्ति के आचार का मूल्यांकन हो सकता है। परन्तु सामाजिक मानकों के आधार पर ही उसका कार्य उचित या अनुचित माना जा सकता है। नीतिशास्त्र का विषय ऐच्छिक कर्म है जिसे हम आचरण कहते हैं अर्थात् मानव-आचार ही नीतिशास्त्र का अध्येय विषय है। अतः प्रवृत्ति-परिणाम के अनुसार होने वाले कर्म को हम ऐच्छिक कर्म कहते हैं और स्वाभाविक कर्म को अनैच्छिक। अतः विवशता, अज्ञानता एवं असमर्थता के कारण होने वाले कर्म ही अनैच्छिक कहे जाते हैं। नीतिशास्त्र सामान्य सामाजिक मानव के आचरण की समीक्षा करता है तथा मानकों एवं आदर्शों का निर्माण भी करता है जिन्हें नैतिक सिद्धान्त कहते हैं। नैतिकता तो मध्यमवर्गीय मानवीय है, जो दो अन्तों का परित्याग करता है वही मानवीय नियंत्रण को स्वीकार कर सकता है। समाज मंे कुछ व्यक्तियों का आचरण आदर्शों के अनुसार होता है जिसे हम श्रेष्ठ, शुभ, उचित आचरण कहते हैं।

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