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Abstract

भारतीय कवि की तो समस्या और भी कठिन है, क्योंकि एक ओर तो वह किसी भी अन्य देश और संस्कृति में पले-पुसे अपने समाधर्माओं की तुलना में कहीं अधिक विश्व-चेतस् है और दूसरी ओर, वह अपनी अभी तक जीवित परम्परा के शक्ति-केन्द्र से, उसके पावनतामूलक ज्ञान-प्रतीकों से, सब कुद को ऋत के ढाॅंचे में बिठाने-वाली सृष्टि-विद्या और संवेदना से भी वास्तविक जीवनदायी और सृजनात्मक सम्बन्ध स्थापित करने की स्थिति में नहीं है। निश्चय ही इसके अपवाद भी हैं और वे ही आशा के आधार भी हैं, किन्तु अधिकतर रचनाकर्मी न केवल उस विश्व-दृष्टि से विच्छिन्न हो चुके प्रतीत होते हैं, बल्कि इस विच्छिन्नता की त्रासदी से भी उस तरह उद्विग्न नहीं दीखते। निराला के ‘तुलसीदास’ को ही, मसलन-यानी स्वयं निराला को इस सांस्कृतिक लयभंग का प्रत्यासन्न यथार्थ जिस तरह विकल करता था, उससे जूझने की जिस कोटि की चेष्टा का अन्तः साक्ष्य उनके कवि-कर्म में उजागर होता है, वैसा उनका उत्तराधिकार सम्हालने का दावा करने वाले कितने परिवर्तियों में दिखाई देता है? पृथ्वी पर उगते-फैलते इस मरूथल में कवि के लिए अपने कवि होने के तर्क से ही भीतर-बाहर के ऐसे आत्यान्तिक अलगाव को पचा लेना न तो सम्भव है, न वांछनीय।

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