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श्रीमद्भागवद्गीता का यह श्लोक मानव को बिना कर्म फल की लालसा के कर्म करने की प्रेरणा देता है। भारतीय हिंदू समाज में अनादि काल से ही कर्मयोग के महत्व को स्वीकार किया जाता रहा है। यहाँ बिना कर्म के जीवन का अस्तित्व ही नहीं है। प्रकृति के गुणों के अनुसार भी मानव कर्म करने के लिए बाध्य है। इसलिए कर्म का अस्तित्व प्रकृति से भी जुड़ा हुआ है। इसलिए वैदिक काल से लेकर अब तक मानव मात्र का अंतिम लक्ष्य परम तत्त्व की सिद्धि यानी जन्म.मृत्यु के बंधन से मुक्त होना रहा है। इस ध्येय को मानव प्रभु भक्ति के द्वारा ज्ञान को धारण करना चाहता है। लेकिन जब तक वह सत् कर्मों को लेकर नहीं चलताए तब तक जन्म.मृत्यु के बंधन से मुक्त नहीं हो सकता। श्रीमद्भागवद्गीता में श्री कृष्ण जी ने श्री अर्जुन को तथा महात्मा कबीरदास ने अपनी वाणी द्वारा मानव मात्र को इसी कर्मयोग का महत्त्व प्रतिपादित किया है। इस उपदेश को धारण करके मनुष्य सांसारिक विषय.वासनाओंए मोह.माया आदि के बंधन से निवृत्त होकरए मानव.मात्र के कल्याणार्थ कर्म करता हुआए अपने कर्मों को प्रभु चरणों में अर्पित करता चलेए जिससे उसका स्वयं का भी कल्याण हो सके। श्रीमद्भागवद्गीता में श्री कृष्ण जी अर्जुन को जब ज्ञान एवं भक्ति के महत्व को बताते हैं तो अर्जुन दुविधा में पड़ जाता हैए फिर श्री कृष्ण जी बताते हैं कि राजा जनक जैसे ज्ञानवान व्यक्ति भी आसक्ति रहित कर्म द्वारा ही परम सिद्धि को प्राप्त हुए। इसी प्रकार कर्म सन्यास से कर्म योग साधना में सुगम होने से श्रेष्ठ है। ऐसे ही कबीरदास जी कहते हैं कि कर्म.व्यापार एवं सदाचार ही मुक्तिदायक है। कर्म से ही ईश्वर पालक है। इसलिए आज के युग में भी मनुष्य का कर्मयोगी होना आवश्यक है ताकि उसको दुरूखों से मुक्ति मिल सके। ऐसा करने से वह मानव कल्याणार्थ कर्म करेगाए जिससे विश्व में सद्भावनाए प्यार.प्रेमए भाईचाराए समताए समानताए एकता आदि का भाव पैदा होगा और उसको कर्मों के बंधन से मुक्ति मिल जाएगीए जो सबके जीवन का अंतिम लक्ष्य है।

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