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Abstract

प्राचीन समय में भारतीय संस्कृति ने व्यक्ति के गुणए कर्म एवं स्वभाव को आधार बनाकर व्यक्ति की प्रकृति के अनुसार कर्म व्यवस्था.वर्ण व्यवस्था की थीए जो बुद्धिधर्मी थेए वे ब्राह्मणए जो शक्तिमान थेए वे क्षत्रियए जो अर्थवान थेए वे वैश्य तथा जो इनसे रहित थेए किंतु श्रम के विश्वासी थेए वे शूद्र कहलाये। धर्मसूत्रों तथा दूसरी ब्राह्मण पुस्तकों में ब्राह्मणए क्षत्रिय और वैश्य को छोड़कर जो दूसरी श्रमजीवी जातियाँ थीं उन्हें भारतीय समाज में शूद्र जातियाँ घोषित कर दिया गया था। पर वस्तुतः ये कामगार और शिल्पी जातियाँ थीं। अमरकोष में शिल्पी ही शूद्र कहा गया है। प्रत्येक व्यक्ति अपने कर्म एवं श्रम के आधार पर एक निश्चित वर्ण में रहता थाए किंतु धीरे.धीरे समाज का यह दृश्टिकोण अपने मूल रूप से परिवर्तित हो गया प् वर्ण.व्यवस्था में कर्म के स्थान पर जन्म निश्चित हो गया प् इस जाति व्यवस्था का रूप बिगड़ने लगा प्  देखते ही देखते समाज में दो वर्ग बन गए ए श्एक उच्च वर्ग और एक निम् वर्गश्। उच्च वर्ग द्वारा निम्.वर्ग को दबानाए उन्हें असवर्ण संबोधन कर एक घिनौनी प्रथा का जन्म हुआ . श्छुआछूतश्। वस्तुतरू दलित संबोधन से समाज के पददलितए अधिकार.विहीन और सामाजिक.धार्मिक उपेक्षा के शिकार असवर्ण का बोध होता है। आजकल प्रचलित डिप्रेस्ड क्लासए शिडूल्ड कास्टए गुलाम वर्गए हरिजन आदि इन्हीं पद दलितों के लिए प्रयुक्त किये जाते हैं। दलित.साहित्य की अवधारणा का जन्म सर्वप्रथम मराठी साहित्य में हुआ।

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