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Abstract

जैसा कि हम सब जानते हैं कि परिवार समाज की लघुतम इकाई है। परिवार के विकास से ही समाज का विकास संभव है। परिवारए जिसमें विवाह तथा रक्त संबंधों से बने रिश्तों को शामिल किया जाता है। ऐसे परिवार में व्यक्ति के विकास के साथ रिश्तों का भी विकास होता है। जहाँ आपसी सहयोगए प्रेमए सौहार्दए विश्वासए त्यागए बलिदान आदि की आवश्यकता होती है ताकि सबका कल्याण हो सके। लेकिन आज के आपाधापी के युग में जहाँ स्वार्थ का भाव सर्वोपरी हो गया हैए जिससे परिवार का विघटन होने लगा है। आपसी रिश्ते चाहे वह पति.पत्नी के होंए  संतान के होंए भाई.भाई के होंए सास.बहू के हों या कोई अन्य होंए उन में दरार आ चुकी है। जिसके कारण पारिवारिक सद्भाव समाप्त हो गया है। ऐसे में गोस्वामी तुलसीदास कृत श्रामचरितमानसश् में चित्रित पारिवारिक सद्भाव को ग्रहण करने की आवश्यकता है। यहाँ परिवार का प्रत्येक सदस्य एक.दूसरे के हितार्थ त्याग एवं बलिदान के लिए तत्पर रहता है। जैसा कैकेयी मंथरा के बहकावे में आकर भरत के लिए राज्य एवं राम के लिए वनवास मांगती है तो राम खुशी.खुशी अपने भाई को राज देकर वनवास चला जाता है। सीता और लक्ष्मण राम के साथ ही वनवास चले जाते हैं। जब भरत अयोध्या आता है और उसे यह सब पता चलता है तो वह शोक से व्याकुल हो जाता है और राम जी से मिलने वन जाता है। भरत व शत्रुघ्न सीता को माँ समान मानकर उनके चरण स्पर्श करते हैं। सीता भी सभी माताओं के चरण स्पर्श करती हैं और उनकी सेवा करती है। इस प्रकार के पारिवारिक सद्भाव के उदाहरण अन्यत्र दुर्लभ हैं। यही कारण है कि मध्यकाल में रचित एवं त्रेतायुग की कथा को लेकर चलने वाली इस महान रचना में एक श्रेष्ठ परिवार कैसा होए इसका गहन चित्रण किया गया है। आज के युग में श्रेष्ठ परिवार एवं पारिवारिक सद्भाव के लिए इस महाकाव्य का विशेष महत्त्व है। इसी कारण यह महाग्रंथ एक अमर रचना है।

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