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Abstract

वर्तमान में शिक्षण वह प्रक्रिया है जिसमें प्रारूप एवं परिचालन की व्यवस्था इसलिए की जाती है जिससे छात्रों के व्यवहार में परिवर्तन लाया जा सकें। पहले शिक्षण कार्य को शिक्षक केन्द्रित मानते थे जिसमें अधिक विकसित व्यक्ति कम विकसित व्यक्ति की शिक्षा के लिए प्रयास करता था फिर धीरे. धीरे शिक्षण को अन्तरूप्रक्रिया माना जाने लगा जिसमें शिक्षक व छात्र दोनों के मध्य शाब्दिक या अशाब्दिक अन्तरूप्रक्रिया होती है। शिक्षण में शिक्षक व छात्र दोनों ही क्रियाशील होते थे। इसमें शिक्षक को केवल पथ.प्रदर्शक माना गया और छात्र प्रश्नोत्तर द्वारा अपनी शंकाओं का समाधान कर सकते थे। बी0ओ0 स्मिथ के अनुसारए शिक्षण क्रियाओं की एक विधि है जो सीखने की उत्सुकता को जागृत करती है।

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