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Abstract

देश की वर्तमान विपन्न अवस्था को देखकर काव्य-कृति का संतृप्त हृदय मुखरित होता है, वह देखता है कि भौतिक स्तर पर देश कहाँ पहुँच गया है। जो देश सुई भी नहीं बना सकता था, विज्ञान और तकनीकी की सहायता से उसने आश्चर्यजनक प्रगति की है। विश्व के विकासशील देशों मेंु ऊँचा स्थान बनाया। इन भौतिक उपलब्धियों की जगमगाहट से वह अपने नैतिक मूल्यों तथा भारतीय परंपराओं को भूल गया है, जिन महापुरुषों ने संकट की घड़ियों में मार्ग-प्रशस्त किया था, वह चले गए, हम भटक गए। हमें स्मरण रखना चाहिए कि जब पथ उलझन से भर जाता है, अवरूद्ध हो जाता है, तो नई राह हमें खुद बनानी पड़ती है।

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