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Abstract

एक प्रबल राजनीतिक.बोध दलित समाज में उद्भूत करने के लिए दलित को मुख्यधारा राजनीति का इतिहास जानना है। स्वतंत्रता आंदोलनकालीन भारतीय राजनीति में कांग्रेसए मुस्लिम लीग प्रमुख दो दल थे। बाद में छोटे.छोटे दल आते.जाते रहे। लीग पाकिस्तान की मांग करती रही और कांग्रेस की बागडोर सवर्ण जातियों के हाथ में थी। विदेशी शिक्षा प्राप्त नेताओं की ज़ेहन में स्वतंत्रता की बात तो थीए पर भारतीय समाज की बात नहीं थी। इसलिए जाति के नाम पर व वर्ण के नाम पर समाज की बुरी हालत जारी रही। गांधी जी दलितोंए स्त्रियों को साथ लेने की बात करते थेए उसका ज़ोरदार असर व्यावहारिक तौर पर नज़र नहीं दिखायी दिया। इसलिए अंबेडकर दलित राजनीति की बात उठाने लगे। राजनीतिक.सामाजिक एवं आर्थिक उन्नयन के बिना दुर्भल तबके के लोगों की उन्नति नहीं होगी। भारतीय राजनीतिक प्रणाली में दलित जातियों को अहम स्थान अब तक नहीं मिला है। ज्योति मिश्रा और आशीष रंजन के अनुसारदृ श्भारतीय राजनीतिक प्रणाली पर बहुत लम्बे समय तक ऊँची जातियों की चौधराहट कायम रही।श् ;ज्योति मिश्राए अशीष रंजनए अनुण् नरेश गोस्वामीए प्रतिमानए जनवरी.जून 2014ए पृण् 133द्ध ऊंची जातियों की चौधराहट की वजह से दलित समाज की राजनीतिक आकांक्षाएं धुंधली होती गईं। प्रभुत्ववादी राजनीतिज्ञों ने अपनी संप्रभुता के बल पर दलित को मुख्यधारा राजनीति से हमेशा दूर रखा। मुख्यधारा की राजनीतिक चालों में पडकर दलित समाज टूटता रहा।

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