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Abstract

श्री शाह जी की कई कवितायें ऐसी हैं जिनमें ऐसे पौराणिक पात्रों और प्रतीकों का बडा मार्मिक उपयोग किया गया है। ये पात्र हमारी जातीय स्मृति को जागृत करते हुए आज के ठेठ वर्तमान कों खंगालने तथा उसे प्रकाशित करने, उसके संकटों का हल करने के कमा में आते हैं। उल्लेखनीय है कि श्री शाह की चिंताओं की परिधि में भारत का इतिहास और पुराण निरंतर बना रहा है- यह उनके काव्येत्तर लेखन से उनके निबंधाकार तथा समालोचक रूप से परिचित पाठक को स्पष्ट हो जाता है। वे ही प्रयोजन और पर्यवेक्षक, अपेक्षित गंभीरता तथा कहीं-कहीं व्यंग्य- विनोदपूर्वक भी उनकी कविताओं में झलकते हैं।

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