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Abstract

हिंदी साहित्य इतिहास के पूर्व मध्यकाल में भक्ति.भावना एवं समाज.सुधार को लेकर एक विशेष धारा का जन्म हुआए जिसे संत काव्यधारा के नाम से जाना जाता है। जिसने अपने समाज कल्याण के उपदेशों द्वारा एक ऐसी निर्मल धारा बहाईए जिस पर चिंतन करने के लिए जन साधारण के साथए उस समय के शासक भी विवश हो गए। इन संत कवियों में संत गुरु नानकदेव एवं संत कबीरदास जी का नाम सर्वोपरि हैए जिन्होंने अपने सामाजिक चिंतन द्वारा समाज में फैले आडंबरए पाखंडए वैषम्यए जातिगत भेदभावए धार्मिक असहिष्णुता आदि के साथ सामान्य नागरिकए नारी आदि पर हो रहे अत्याचार पर बिना किसी भय के विचार व्यक्त किया और बुराइयों का विरोध किया। पतित हो रही सभ्यताए संस्कृति एवं संस्कारों में नए प्राण डालने का प्रयत्न किया। भगवान की पूजा.अर्चना के नाम पर विभाजित जनता को समझाने का प्रयत्न किया कि हम सब एक ईश्वर की संताने हैं। सभी का शरीर पांच तत्वों के मिश्रण से ही बना है। इसलिए इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए हमें उस परम तत्त्व की संतानए प्रत्येक प्राणी चाहे वह मनुष्य हो या पशु.पक्षीए सभी को सम्मान देने की आवश्यकता है। ऐसा करके हम एक ऐसे समाज का निर्माण करेंगेए जहाँ किसी प्रकार का कोई भयए डरए वैषम्यए द्वेषभाव आदि नहीं होगाए बल्कि समताए समानताए भाईचाराए आपसी.सहयोगए प्यार.प्रेमए मित्रता होगी। ऐसे समाज में सभी सुखमयी एवं आनंदमयी जीवन जीते हुएए एकेश्वर की भक्ति करते हुएए मोक्ष को प्राप्त करेंगे। आज फिर से गुरु नानकदेव एवं कबीरदास जैसे संतों द्वारा सुझाए गए रास्ते पर चलने की आवश्यकता है। उनके सामाजिक चिंतन को ग्रहण करने की जरूरत हैए ताकि मानव समाज में शांति स्थापित की जा सकेए जिसकी आज अत्यधिक आवश्यकता है। क्योंकि एक.दूसरे से आगे निकलने की होड़ में मानवता कहीं दूर पीछे रह गई है।

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