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Abstract

कृषि हमारी संस्कृति से जुड़ी है। प्राचीन मनुष्य ने अपने जीवन यापन के लिए खेती का आरम्भ किया था। विकास होने के साथ.साथ कृषि उत्पादन का क्षेत्र बन गयी। उस समय भारत में अधिकतर किसानी लोग थे जो भारत में खाद्य क्षेत्र का प्रमुख आधार रहा था। लेकिन 1990 के बाद उदारीकरण और निजीकरण के बलबूते पर कृषि क्षेत्र को सुधारने की कोशिश करने लगी। जहाँ परंपरागत कृषि रीति को बदलकर विकास के नए मॉडल से जुड़े परिवर्तन को खड़ा कर दिया। कृषि पर नियंत्रण किसान नहीं बल्कि उन पर विदेशी कारपोरट निगमों के द्वारा संपन्न होने लगे। परंपरागत बीज के बदले बयोटिक फसलों का इस्तेमाल करने लगा। बीजए खादए कीटनाशक आदि का उत्पादन और कीमत भी तय करने वाला विदेशी कंपनियाँ हैं। इस प्रकार विदेशी कंपनियाँ द्वारा पेटेंट प्राप्त कर कृत्रिम बीजों का इस्तेमाल करने लगा और ज़मीन कंपनियाँ हड़पने लगी। असल में यह स्थिति किसानी जीवन को और बदत्तर करने लगे। सब कुछ करने का अधिकार आखिर कंपनियों के पास चला गया। आर्थिक नीति एवं सुधार असल में किसानों और खेती सुधारने का मार्ग नहीं था यह केवल मुनाफे के लिए बनायी गयी नीति है। इस षडयंत्र में भारतीय किसान अपने स्वत्व को खो दिया। कृषि का व्यावसायीकरण ही यहाँ प्रबल है। श्विश्व व्यापार संगठन के तीन ऐसे दस्तावेज़ हैंए जो सीधे.सीधे कृषि से जुड़े हुए हैं पहलाए व्यापार संबन्धी बौद्धिक संपदा अधिकार समझौता ;ट्रिप्सद्ध। दूसरा ष्स्वच्छता एवं वानस्पतिक स्वच्छता समझौता ;एसण्पीण्एसण्एद्ध और तीसरा कृषि पर समझौता ;एण्ओण्एद्ध ट्रिप्स के तहत बीजों को बौद्धिक संपदा घोषित कर इनके आदान.प्रदान पर रोक लगाने की व्यवस्था है। इसी समझौते में अंतर्निहित है पेटेंट की व्यवस्था जिसका लाभ उठाकर मोसेंटो और सिजेंटा जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ दुनिया भर में बीजों पर एकाधिकार जमा रही है।श् ;अभय कुमार दुबेए शोषण के अभ्यारण्यए पृण् 23द्ध इस प्रकार बीज खादए उत्पाद आदि का क्षेत्र किसान की परिधि से बाहर चला गया।

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