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Abstract

गुरु ग्रंथ साहिब इस दुनिया का ऐसा एकमात्र धार्मिक ग्रंथ हैए जो की धार्मिक स्थानों में किसी भी इंसान को बिना किसी जाति व धर्म के भेदभाव के प्रवेश करने का समर्थन करता है। गुरु ग्रंथ साहिब में गुरु साहिबानों तथा अन्य बाणीकारों की दर्ज रचनाओं को हम गुरबाणी के तौर पर जानते है। जिस समयकाल के दौरान गुरबाणी की रचना हुईए उस समय समाज में वर्ण.भेद हावी था। नारी को भी इस सामाजिक ताने.बाने में आदर प्राप्त नहीं था। समाज की इसी कुव्यवस्था के खिलाफ बाणीकारों ने अपनी आवाज को मजबूत तरीके से रखा। यहीं वजह रही की सामाजिक सरोकारों की आवाज ने समाज की विचारधारा को बदलने के लिए संचार की तरह काम किया। इस पुरे कालखंड के दौरान गुरबाणी सामाजिक क्रांति का माध्यम बन गई। समाज के इस बदले परिपेक्ष में गुरु ग्रंथ साहिब में सम्मलित गुरबाणी का बड़ा हाथ था। गुरबाणी आज भी समाज को जोड़ने के लिए अपनी भूमिका निभा रही है। इसलिए गुरबाणी के सामाजिक सरोकारों की विवेचना करने के लिए गुरु ग्रंथ साहिब की संपादन नीति और विषय वस्तु के चुनाव के लिए लिए गए आधारों को समझना जरूरी हैए क्योंकि गुरबाणी के तौर पर किसी रचनाकार की किसी रचना को ऐसे ही गुरु ग्रंथ साहिब में जगह नही दी गई थीए बल्कि उसके पीछे अहम मापदंड थे।

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