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Abstract

शब्द और अर्थ की समस्याए भारतीय दर्शन की एक प्रमुख समस्या रही है द्य भाषिक समस्याओं ;शब्दार्थ स्वरुपद्ध के परिप्रेक्ष्य में बौद्धों द्वारा प्रवर्तित अपोहवाद का अपना विशिष्ट महत्व है द्य अपोह का मूल अर्थ निषेध या निराकरण ;व्यावृत्तिद्ध माना गया है द्य बौद्ध दार्शनिक इसका प्रयोग इसी अर्थ में करते हैं द्य ष्गायष् शब्द से घोड़े आदि अन्य पदार्थों का निराकरण ;अपोहद्ध हो जाता है द्य इस निराकरण के कारण हम अनुमान करते हैं कि ष्गायष् शब्द गाय रुपी पदार्थ का निर्देश करता है द्य1 बौद्ध दार्शनिक शब्द और अर्थ में कोई संबंध नहीं मानते द्य उनके मतानुसार शब्द से अर्थ ज्ञान का प्रकार यह है. जैसे ष्गायष् शब्द गाय पशु का बोध नहीं कराताए अपितु ष्अपोहष् अर्थात अन्य की व्यावृत्ति ;निषेध निराकरणद्ध ए जैसे अश्व आदिए करता है द्य तदन्तर इस अपोह ;निषेधद्ध के द्वारा अन्य व्यावृत्ति ;निषेधद्ध होने पर अनुमान से यह ज्ञान प्राप्त करते हैं कि यह गाय है द्य2 कहने का तात्पर्य यह है कि अपने से भिन्न का निषेध करते हुए विधि ;स्वीकारात्मक वाक्यद्ध की स्थापना ही अपोहवाद है द्य जैसे गाय हैए कहने पर गाय के भिन्न का निषेध करते हुए गाय के अर्थ की स्थापना द्य शब्द के वाच्यार्थ ;अर्थद्ध को अन्य शब्दों के वाच्यार्थ से पृथक करना अर्थात अन्यापोह ही अपोह है द्य अपने वाच्यार्थ का अन्य वाच्यार्थों से पृथकीकरण ही शब्द की अपोहात्मकता है द्य बौद्धों का भाषा संबंधी सिद्धान्त अपोहवाद के नाम से प्रसिद्ध है

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