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Abstract

व्यंग्य का जन्म व्यंग्यकार की नैतिक चिंतन से जुडा होता है । लेखक की सजगता उसे सफल व्यंग्यकार बनाती है । व्यंग्य के विषय में कह सकते हैं कि व्यंग्य सामाजिक नैतिक चिंताओं से भरा हुआ गहरा सरोकार जब आक्रामक होता है तो वही व्यंग्य कहलाता है । समाज में व्याप्त अनैतिकताए अत्याचारए हिंसाए विसंगति पर व्यंग्यए एक प्रकार की साहित्यिक चोट है जो साहित्यकार पूरे जोर के साथ उन पर करता है । संवेदनशीलता के साथ यदि कोई भी अंश दिल को गुदगुदाता है या कहीं कोई हल्की.हल्की सुरसुराहट उभरने लगती है और पाठक की आँखें जब अनुभूति के अतिरेक से और भी अधिक तल्लीनता के साथ.साथ रचना में गुंथ जाती है और पीन चुभन सी मीठी.मीठी दर्द होठों से कानों तक लरज उठता है तब मैं मानता हूँ कि व्यंग्य कारगर हुआ है ।श्   राग दरबारी के रचयिता श्रीलाल शुक्ल का कथन है कि ष्व्यंग्य ऐसा सहस्त्र शस्त्र है जो प्रहार भी करें और चोट खानेवाला हँसकर सह


लें ।ष्   आदर्श व्यंग्य में मनुष्य और जीवन की मात्र हँसी उडाने की ललक नहीं होती अपितु उनका लक्ष्य प्रहार करना है । उन कुरुप तथ्यों पर प्रहार जो मानवीय प्रगति और जीवन की गतिशीलता में बाधक हो ।

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