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Abstract

सम्यक शिक्षा वही है जो विद्यार्थी को वास्तविक जीवन जीने की यथार्थपरक और जटिल समस्याओं का सामना करने की कला सिखाए ताकि वे जीवन के स्पंदन को महसूस कर सके। अध्यापन, शिक्षा रूपी शरीर का हृदय है, जिसके स्पन्दन से ही शिक्षा के जीवित या मृत होने का आभास मिलता है। शिक्षा के तीनों ध्रुवो शिक्षक, शिक्षार्थी तथा पाठ्यचर्या की संलग्नता अध्यापन प्रक्रिया से पूर्ण होती है। अध्यापन प्रकिया एक सतत् विकासात्मक, व्यवसायिक समाजिक अन्तः प्रकिया है मानव सभ्यता के क्रमिक विकास में जैसे - जैसे सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक एवं शैक्षिक परिवर्तन होते गये वैसे - वैसे अध्यापन प्रक्रिया में भी परिवर्तन होते गये। शिक्षा एक गतिशील प्रक्रिया है और समय के साथ शिक्षण में परिवर्तन लाना अवश्यम्भावी हो जाता है। इस चर्चा का निहितार्थ यह है कि सम्यक शिक्षा की जिम्मेदारी शिक्षक, शिक्षार्थी, विद्यालय, समाज तथा सम्पूर्ण समुदाय की साझी भागीदारी है। शिक्षा के उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए अध्यापक शिक्षा को समझना, परिवर्तन लाना अत्यन्त आवश्यक हो गया है। अध्यापक शिक्षा के क्षेत्र में व्याप्त वैचारिक जड़ता को दूर करना होगा। स्वयं शिक्षको को भी सम्यक जीवन के लिए उपयोगी सम्यक शिक्षा की स्पष्ट अवधारणा बनानी होगी। अध्यापक शिक्षा का स्वरूप ऐसा होना चाहिए जिससे शिक्षक मननशील बन सके और अपने विद्यार्थियों को भी इस ओर अग्रसर कर सके।

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