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Abstract

वर्तमान में जब साहित्य परिचर्चा होती है तो ‘विमर्ष‘ षब्द स्वतः बहस के केन्द्र में आ जाता है। षब्द प्रयोग की दृष्टि से ‘विमर्ष’ षब्द अत्यन्त प्राचीन है। ‘विमर्श‘ का अर्थ है-सोच विचार कर तथ्य या वास्तविकता का पता लगाना, किसी बात या विषय पर कुछ सोचना, समझना, विचार करना, गुण-दोष आदि की आलोचना या मीमांसा करना, जांचना और परखना, किसी से परामर्ष या सलाह करना, ज्ञान।1 नालन्दा विषाल षब्द सागर में विमर्ष को, ”किसी बात का विचार या विवेचन, आलोचना, समीक्षा, परीक्षा, परखने का काम परामर्ष, सलाह, अधीरता, असंतोेष।”2 के अर्थ में लिखा गया है। विमर्ष षब्द सोच विचार, विचार  विनिमय,चिन्तन मनन को द्योतित करता है। विमर्ष ही समकालीन उपन्यासों की षक्ति है। समाज और साहित्य एक दूसरे के पूरक होते हैं। साहित्य रचना सामाजिक व्यवस्था के अनुसार ही विनिर्मिति होती है। समाज की सारी व्यवस्थाओं को साहित्यकार सांकेतिक रूप में अपनी रचनाओं में समेटता है। साहित्य की अनेक विधाएं हैं, इन विधाओं में उपन्यास अपने आप में महत्वपूर्ण है। समाज में घटित घटनाओं का अत्यन्त सजग बोध उपन्यास के द्वारा मिलता है।3 मनुष्य सामाजिक प्राणी है, इसलिए कुछ सामाजिक व्यवस्थाओं का सामना करना पड़ता है। समाज में स्थित इन व्यवस्थाओं में अर्थात् जातीय, नैतिक,षैक्षणिक आदि सामाजिक व्यवस्थाएं षामिल होती हैं। उपन्यासकारों ने अपने समकालीन परिवेश से एकाकार होकर अपने उपन्यासों में वर्तमान विसंगतियों और समस्याओं को व्यक्त किया है। विगत दो दषकों से विमर्ष की संकल्पना साहित्य मीमांसा में प्रयुक्त हो रही है। विविध विमर्षमूलक विचारों का अंकन हिन्दी के समकालीन उपन्यासों में विस्तार से हुआ है।4 आधुनिक काल में विमर्षवादी अवधारणा के अन्तर्गत उत्तर आधुनिक विमर्ष, स्त्री विमर्ष, झुग्गी झोंपड़ी विमर्ष, आदिवासी विमर्ष, अल्पसंख्यक विमर्ष, सत्ता विमर्ष, षिक्षा विमर्ष, सेक्स विमर्ष, श्रमिक विमर्ष, बाज़ार विमर्ष,सह-जीवन विमर्ष, पंजाबी संस्कृति विमर्ष आदि का समकालीन उपन्यासों में विष्लेषण किया गया है जिनमें से सह-जीवन विमर्ष का प्रारूप औपन्यासिक वैचारिक मन्थन में इस प्रकार है।

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