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Abstract

प्रस्तुत शोधपत्र में सर्वहारा वर्ग के हित-चिंतन के प्रति स्वामी विवेकानन्द की सहानुभूतिपूर्ण दृष्टि, उसके सम्भावित साधन के रूप में समाजवाद जैसी किसी भौतिक व्यवस्था को लागू किए जाने के विकल्प पर विचार एवं अंततः भारतीय संस्कृति के अनुरूप, अद्वैत वेदान्त के क्रियात्मक पहलू के रूप में सेवायोग को निदानतः प्रस्तुत किया गया है। प्रस्तुत शोधपत्र में इन बिंदुओं पर मुख्यतः दो खण्डों में विचार किया गया है। प्रथम में स्वामी विवेकानन्द के समय की तत्कालीन सामाजिक परिस्थिति के प्रति अंसतोष से उत्पन्न विचारों का उल्लेख किया गया है। इसी के साथ वैकल्पिक व्यवस्था के रूप में समाजवाद पर भी विचार किया गया है। इसी में इस निष्कर्ष पर पहँुचा गया है कि स्वामी विवेकानन्द भारतीय समाज व्यवस्था में पश्चिमी किस्म के समाजवाद को लागू किए जाने के पक्ष में नहीं थे। दूसरे खण्ड में अद्वैत वेदान्त के क्रियात्मक पक्ष के अनुप्रयोग से सामाजिक असमानता के निवारण पर विचार किया गया है।

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