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Abstract

नालंदा बिहार राज्य का कृषि प्रधान जिला है। यहाँ खरीफए रबीए गरमा तथा भदई फसलों का उत्पादन किया जाता है। नालंदा जिला के बढ़ती हुई जनसंख्या के कारण अनाज की पैदावार को बढ़ाने के लिए रसायनिक खादों का उपयोग करके उत्पादन को बढ़ाने में ध्यान केंद्रित किया गयाए जिससे उत्पादन तो बढ़ा परंतु मिट्टी की उर्वरक क्षमता धीरे.धीरे नष्ट होने लगी है। इसलिए आज के समय में नालंदा जिला में जैविक खेती करना बहुत ही जरूरी हो गया है। जैविक खेती करने से कई तरह की बीमाररियां तो नष्ट होती है बल्कि प्रदूषण से भी मुक्ति मिलती है। जैविक खेती के कारण किसानों की भूमि की उपजाऊ क्षमता बहुत अधिक बढ़ जाती है और अधिक मात्रा में फसल का उत्पादन होता है। जैविक खेती करने से कम मात्रा में सिंचाई की आवश्यकता पड़ती है क्योंकि जैविक खेती करने पर मिट्टी नमी बनाए रखती है। जैविक खेती उपयोग करने से खेतों की पारिस्थितिकी तंत्र का प्रभाव बना रहता हैए और फसल चक्र प्रभावित नहीं होता है। किसान जैविक खेती से अपनी भूमि को बंजर होने से भी बचाता है क्योंकि रसायनिक खेती करने से मिट्टी कम उपजाऊ वाली हो जाती है और मिट्टी की उर्वरक क्षमता में भी कई तरह का बदलाव दिखाई देता है। जब कोई किसान प्राकृतिक तरीके से जैविक खेती करता है तब उसको काफी लाभ होता है क्योंकि आज के समय बाजार में जैविक खेती से प्राप्त अनाज की मांग बहुत अधिक है क्योंकि रसयनिक तरीके से की गई खेती से प्राप्त अनाज से कई तरह की बीमारियां फैल रही है। इसलिए जैविक खेती से प्राप्त अनाज की मांग दिन.प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। यदि किसान जैविक खेती करके अपना उत्पादन बढ़ाए तो वह जैविक खेती के माध्यम से काफी लाभ प्राप्त कर सकता है। उपर्युक्त जैविक खेती की उपयोगिता को देखते हुये नालंदा में किसान जैविक खेती करने के लिए अग्रसर हुये हैं।


 

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