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Abstract

मनुष्य समाज प्रिय प्राणी है द्य अतरू वह जिस समाज में रहता हैए उस समाज के प्रति उसके कुछ नैतिक कर्तव्य भी होते हैद्य इसलिये वह जिस समाज में रहता हैए उसके व्यवस्था के अनुसार ही जीवनयापन करता है द्य इतनाही नहीं तो उसे  समाज हित के दृष्टि से समाज रचना के साथ अपने जीवन रचना की भी व्यवस्था करनी पडती है द्य जिसमें संस्कारों की  अनिवार्यता स्वीकार की गयी हैद्य व्यावहारिक जीवन. यापन के लिये अनेक नियम बनाये गये हैंद्य इन्हीं  नियमों के तहत ष्पाप.पुण्यष् जैसे विचार समाज में निर्माण हो गये हैं  द्य ष्पाप.पुण्यष् मनुष्य के कर्म के साथ जुडी हुई बातें मानी जाती हैं द्य सामान्यतरू अच्छा कर्म करना यानी ष्पुण्य कमानाष् और बुरा कर्म करना यानी ष्पाप का भागीदारी होनाष्ए ऐसी समाज की राय है द्य ऐसे ही विचार सब समाज धर्मों के अंतर्गत मिलते हैंद्य श् ष्पाप.पुण्यष् की कल्पना वेदों में ष्ऋतष् से संबधित है द्य ष्ऋतष् का अर्थ है ष्संसार और जीवन की व्यवस्थित स्थितिष्द्य इस व्यवस्थित स्थिति का उल्लंघन ही जीवन में गडबडी अर्थात अव्यवस्था उत्पन्न करनेवाला हैए अतरू वही पाप है द्य तदनुसार व्यवस्थित समाज में अव्यवस्था उत्पन्न करना अथवा इसके नियमों का उल्लंघन करना भी पाप हैद्यश्१ अर्थात समाज नियमों के अनुसार आचरण करना यानी ष्पुण्यष् तो समाज के नियामों के खिलाफ आचरण करना यानी ष्पापष् द्य इसतरह समाज में ष्पाप. पुण्यष् संस्कारए धर्मए नीति और सामजिक विधान से जुडी बातें मानी जाती हैं द्य संस्कारए धर्मए नीतिए और सामाजिक विधान के अनुसार आचरण करने पर

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