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Abstract

डार्विन के महत्त्वपूर्ण सिद्धांत का यह कथन कि श् सबसे योग्य ही जिंदा रहता है श् का हम लोग केवल आम बोलचाल की भाषा में  ही प्रयोग करते हैं जबकि यह सिद्धांत केवल मानवए जीव जंतु एवं वनस्पतियों पर ही लागू नहीं होता वरन हमारे दैनिक उपयोगध्उपभोग के प्रत्येक उत्पाद पर भी समान रूप से प्रभावी होता है । श्विपणन की दुनिया बदल चुकी है। आप इस परिवर्तन का नेत्रत्व कर सकते हैं या इस परिवर्तन के शिकार हो सकते है ।श् डेनिस मोरिसन की उपरोक्त पंक्तियाँ उपभोक्तावाद वाली बाज़ार व्यवस्था में अपने उत्पादों एवं ज्ञान के अस्तित्व को बचाने तथा उनको प्रतियोगी बनाये रखने के लिए विपणन व्यवस्था की आवश्यकता को उल्लेखित करती हैं। जो उत्पाद एवं ज्ञान ;चाहे वह पारंपरिक हो या आधुनिकद्ध समय के साथ और उपभोक्ता के अनुरूप परिवर्तित होकर उपभोक्ता के लिए अपनी उपयोगिता सिद्ध करते हैंए वही बाज़ार और विपणन व्यवस्था के माध्यम से अपने अस्तित्व को भी बचा पाने तथा आर्थिक मूल्य को बनाये रखने में सफल होते हैं । यहाँए पारंपरिक ज्ञान व्यवस्था के विपणन के लिए उत्पाद शब्द की व्याख्या जरूरी है । विपणन को मुख्यतः किसी उत्पाद एवम सेवा से जोड़ा जाता हैए परन्तु पारंपरिक ज्ञान व्यवस्था के उत्पादों में पारंपरिक ज्ञान कोष से निर्मित उत्पादए सेवाए स्थानए अनुभवए भाषा.बोलीए परम्परायेंए संपत्तिए घटनाए सूचना एवम अन्य कोई भौतिक अथवा काल्पनिक अवधारणा भी हो सकती है। नवाचारए उपभोक्ता केन्द्रित बाज़ार एवं विपणन व्यवस्था से दूर होने के कारण ही  ष्हिमालय की समृद्ध पारंपरिक ज्ञान व्यवस्थाष् के उत्पाद अपने अस्तित्व को भी बचा पाने तथा आर्थिक मूल्य को बनाये रखने में सक्षम नहीं हो पा रहें  है। वर्तमान सन्दर्भ में इसका स्पष्ट प्रभाव उत्तराखंड की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत एवं लोगो की जीवन शैली पर भी  पढता नजर आ रहा है ।

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