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Abstract

परिवर्तन एक गतिमान प्रक्रिया है। परिवर्तन की गती अनेक कारकांे पर निर्भर करती है। चंूकी गाँवों में जनसंख्या कम होती है। गा्रमीण समाजिक जीवन व संास्कृतिक व्यवहारों में गतिशीलता कम होती है। गा्रमीण क्षेत्रों कि अर्थव्यस्था मुख्य रूप से कृषि व वनोपज पर आधारित होती है। गाँवों का पारंपारिक व्यापार हाट-बाजार तक सीमीत होता है। और रोजगार के नवीन अवसर भी बहुधा कम ही होते हैं। इसलिये गा्रमीण समाज मंे परिवर्तन कि गति धीमी होती है। परंतु जैसे ही किसी गा्रमीण क्षेत्र में कोई औधौगिक गतिविधीयाँ शुरू होती है उस क्षेत्र में नये प्रकार के व्यापार के संभावनाएंे बढ़ जाती है तथा रोजगार के भी नवीन अवसर उपलब्ध होने लगते हैं। इन्ही नये प्रकार के व्यापार के संभावनाओं तथा बढ़ती हुई रोजगार के नवीन अवसरों कें आकर्षण सें न केवल स्थानीय लोग चले आते हैं बल्की नगरों व मुख्य शहरों से भी लोग इन गा्रमीण क्षेत्रों में चले आते हैं। इन बाहरी लोंगो में से तो कुछ इन गा्रमीण क्षेत्रों में प्रवास भी करने लगते हैं। इस प्रकार इन गा्रमीण क्षेत्रों में जनसंख्या का विस्तार होने लगता है। जनसंख्या का विस्तार तथा गा्रमीण समाज का नगरीय समाज व शहरी समाज के संपर्क में आने से गा्रमीण समाज कई पक्ष से प्रभावित होने लगती है। वर्तमान युग विज्ञान व सूचना-प्रौधौगिकी का है। विज्ञान व सूचना-प्रौधौगिकी के क्षेत्र में नित्य नये खोंजो, अविष्कारों तथा इनके प्रसार ने अब गाँवों को भी  वैश्वीकरण कि प्रक्रिया में सम्मीलीत कर लिया है। आधुनिक जीवनशैली के प्रति आकर्षण तथा वैश्वीकरण कि प्रक्रिया में सम्मीलीत होने के कारण कोयले के खनन से प्रभावित छ0ग0 गा्रमीण समाज के समाजिक, संस्कृतिक व आर्थिक पक्ष के आंतरीक व बाहरी अर्थात संरचना में परिवर्तन देखने को मील रहे है।

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