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Abstract

गांधीजी ने श्रीमद् भगवद्गीता के श्लोकों का सरल एवं बोधगम्य भाषा में अनुवाद कर ‘अनासक्ति योग’ की संज्ञा प्रदान की। अनासक्ति योग का पालन राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने अपने जीवन में सतत किया। ‘अनासक्ति योग’ में उन्होंने आश्रम वासियों के जीवन दर्शन का भी उल्लेख किया है। उन्होंने अनासक्ति योग को उपनिषदों का मूलतत्व बताया। योगसूत्र के अनुसार ‘योग चित्त वृत्तियों का निरोध है’। प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा और स्मृति के रूप में पांच प्रकार की साधक एवं बाधक वृत्तियों का योग सूत्र में वर्णन किया गया है। शरीर और इंद्रियों से जो ज्ञान प्राप्त किया जाता है उससे चित्त वृत्तियों का ही निर्माण होता है। बाह्य करण और अंतःकरण के माध्यम से ज्ञान की प्रत्यक्ष और परोक्ष अनुभूति होती है। शरीर और संसार का ज्ञान इसी प्रकार होता है। बाह्य करण के अंतर्गत पांच ज्ञानेंद्रियां और अंतःकरण के अंतर्गत मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार आते हैं। ज्ञान प्राप्ति के इन साधनों के आधार पर ही व्यक्ति को संसार के किसी भी विषय वस्तु का ज्ञान होता है।

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