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Abstract

साहित्य में सदियों से नित्य नये वादों प्रवृतियों, विचारधारों का उद्भव होता रहा है और उस पर अन्यान्य रुपों में चर्चा-परिचर्चा गोष्ठियों, सेमिनारों का आयोजन होता हर है। समकालीन संदर्भ में अनेक साहित्यिक वाद एवं आलोचना-सिद्धान्त चर्चा के विषय बने हुए हैं। इन सिद्धान्तों या वादों के समर्थक, समर्धित विषयसें की महत्ता को सिद्ध करने का प्रयास कर रहे हैं। इस संदर्भ में माक्र्सवाद-उत्तर-माकर्सवाद संरचनावाद, विसंरचनावाद, आधुनिकतावाद-उत्तर-आधुनिकतावाद आदि का नाम लिया जा सकता है। इसके अतिरिक्त दो विषय ऐसे हैं, जिन्होने साहित्य के अन्य विषयों को हाषिये पर ला खड़ा किया है-दलित-विमर्ष और स्त्री-विमर्ष। भारत के ही नहीं अपितु विष्व के अनेक विष्व विद्यालयों में इन विषयों को केन्द्र में रखकर सेमिनारों का आयोजन हो रहा है। परन्तु इसका परिणाम क्या मिलता है? सिद्धान्त और व्यवहार में कितनी समरुपता है, इस पर विचार करने की आवष्यकता है।

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