समाजपरक बौद्ध धर्म की सर्वकालीन प्रासंगिकता

  • Dr. Ramesh Rohit

Abstract

प्राकृतिक नियमों की भंाति समाजषास्त्रीय प्रक्रिया एवं उसके फलस्वरूप विकसित होने वाले नियम भी सत्य पर आधारित होते हैं। यह स्वभाविक सत्य है कि मनुष्य का सामाजिक एवं प्राकृतिक वातावरण उसके चिन्तन एवं विचारधारा को प्रभावित करता रहा है। अति संवेदनषील व्यक्ति उस वातावरण से अत्यधिक प्रभावित होकर महानतम व्यक्तियों की श्रेणी में आ जाते हैं। यह बात तथागत बुद्ध के बारे में निरपेक्ष रूप से सत्य सिद्ध होती है। भारतीय इतिहास पर दृष्टिपात करने पर यह निष्चत रूप से कहा जा सकता है कि तथागत बुद्ध वास्तविक अर्थांे में एक युगपुरूष एवं महामानव थे। बुद्ध पहले धर्म नायक थे जिन्होंने अपने धर्म के लिए किसी भी जाति, वर्ग, सम्प्रदाय और देष की सीमा नहीं रखी। उनका धर्म समता, स्वतंत्रता, बंधुत्व और न्याय एवं समस्त मानव समाज के कल्याण के लिये था। शरत में बुद्ध का आविर्भाव धर्म-दर्षन और इतिहास की दृष्टिकोण से अत्यंत महŸवपूर्ण माना जाता है। बुद्ध की शरत को अनेक चिरस्मरणीय देन हैं उनमें से एक अत्यंत महŸवपूर्ण यह है कि उनके आविर्भाव के साथ ही हमारे देष में वास्तविक रूप से ऐतिहासिक युग का आरम्भ होता है।

Published
2020-02-11