‘भैरवप्रसाद गुप्त’ कृत ‘गंगा मैया’ उपन्यास में चित्रित समाज

  • कोमल

Abstract

‘समाज’ अंग्रेजी के ेवबपमजल शब्द का हिन्दी रूपान्तरण है। व्यक्तियों के समूह से समाज का निर्माण होता है। मनुष्य के बिना समाज और समाज के बिना मनुष्य का कोई अस्तित्व नहीं होता। समाज में सभी नियम स्वयं मनुष्य द्वारा ही निर्धारित होते है। एक के अभाव में दूसरे की कल्पना भी नहीं की जा सकती। समय के साथ-साथ विज्ञान ने बहुत तरक्की कर ली, लेकिन समाज के नियमों में कोई परिवर्तन नहीं आया। कई बार यहीं नियम भावी पीढ़ी के लिए पुरानी रूढ़ियाँ बन जाते है। इससे पहले कि ये नियम पुरानी रूढ़ियाँ बने, हमें इनमें कुछ परिवर्तन कर देने चाहिए। समय के साथ-साथ हमें अपनी सोच भी बदलनी चाहिए। समाज किसी एक इंसान से नहीं बनता, बल्कि कई परिवारों के समूह से बनता है। प्राचीन समय से चला आ रहा है कि स्त्री को पुरुषों के सामने छोटा माना जाता है या समझा जाता है। पुरुष अपनी इच्छा से अपने फैसले ले सकता है लेकिन दूसरी ओर स्त्री को पुरुषों की इच्छा से ही चलना पड़ता है। शादी से पहले पिता, भाई की इच्छा और शादी के बाद ससुर, पति की इच्छा से उसे रहना पड़ता है। दुर्भाग्यवश अगर वह विधवा हो जाए तो इसमें भी उसका ही दोष निकाल दिया जाता है।

Published
2020-02-11