हरिशंकर परसाई की व्यंग्य रचनाओं में वैचारिकता

  • गीता देवी

Abstract

हरिशंकर परसाई की अधिकांश रचनाओं में वैचारिकता दिग्दर्शित होती है। वह जीवन मूल्यों के माध्यम से समाज की कुरीतियों को उजागर करने का प्रयास करते हंै। सामाजिक, धार्मिक, शैक्षिक, राजनैतिक मूल्यहीनता का कोई भी पहलू उनकी दृष्टि से परे नहीं है। वह सदैव वास्तविक तथ्य को पाठक के समक्ष लाने का प्रयास करते हंै। उनका कहना है - एक पीढी कर्म क्षेत्र से दूर होती है तो नवीन पीढी इस क्षेत्र मंे पदार्पण करती है। आवश्यकता इस बात की है कि कोई पीढी पुरानी निरर्थक व निष्क्रिय मानकर उसकी अवहेलना न करे और उसके अनुभवों का लाभ उठाये। पुरानी पीढी भी नई पीढी को अपने समय की दुहाई दे देकर अनुभवहीन न समझे। हर चादर मैली है, पहले मूरख मैली करता था, अब बुद्धिमान करता है।1

Published
2020-02-09