गीतिकाव्य के रूप में ‘नवोढ़ा– विलासम्’ की समीक्षा

  • डॉ समणी संगीत प्रज्ञा
  • ललिता

Abstract

गीति की आत्मा भावतिरेक है। कवि अपनी रागात्मक अनुभूति तथा कल्पना से वर्ण्य विषय तथा वस्तु को भावात्मक बना देता है। गीतियों का निर्माण उस बिन्दु पर होता है, जब कवि का हृदय सुख-दुःख के तीव्र अनुभव से आप्लावित हो जाता है और वह अपनी रागात्मिका अनुभूति को अपनी हार्दिक भावना की पूर्णता के बाह्य अभिव्यक्ति के रूप में परिणत करता है।1

Published
2020-02-07