गीता में योग की अवधारणा : एक अध्ययन

  • डॉ. रोहित कुमार सिंह

Abstract

गीता में योग शब्द का व्यवहार आत्मा का परमात्मा से मिलन के अर्थ में किया गया है । योग-दर्शन में योग का अर्थ ‘चित्त-वृत्तियों का निरोध है , परन्तु गीता में योग का व्यवहार ईश्वर से मिलन के अर्थ में किया गया है। गीता वह विद्या है जो आत्मा को ईश्वर से मिलाने के लिए अनुशासन तथा भिन्न-भिन्न मार्गों का उल्लेख करती है। गीता का मुख्य उपदेश योग है, इसीलिए गीता को योग शास्त्र कहा जाता है। जिस प्रकार मन के तीन अंग हैं- ज्ञानात्मक, भावात्मक तथा क्रियात्मक । इन तीनों अंगों के अनुरूप गीता में ज्ञानयोग, भक्तियोग, और कर्मयोग का समन्वय हुआ है। आत्मा बन्धन की अवस्था में बन्ध जाती है। बन्धन का नाश योग से ही सम्भव है । योग आत्मा के बन्धन का नाश कर उसे ईश्वर की ओर प्रेरित करता है । गीता में ज्ञान, कर्म और भक्ति को मोक्ष का मार्ग कहा है । इस प्रकार गीता को ज्ञानयोग, भक्तियोग और कर्मयोग का समन्वय होने के कारण योग की त्रिवेणी कही जाती है ।

Published
2020-02-07