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Abstract

प्राचीन काल से ही भारत में महिला का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। महिला माँ तथा देवी के रूप में पूज्य रही हैं, उसे शक्ति स्वरूपा माना गया है। प्राचीन ग्रन्थों में उसे ज्ञान, शक्ति और समृद्धि के प्रतीक में प्रकट किया गया।  वैदिक काल में महिला को बहुत अधिक सम्मान प्राप्त हुआ। इस काल की महिला समाज में पूज्य मानी जाती थी। राजपूतों की ऐतिहासिक गाथाओं रामायण, महाभारत आदि में अनेक ऐसी महिलाओं के उदाहरण उद्धृत हैं, जिनसे उनकी तत्कालीन स्थिति का सहजता से अनुमान लगाया जा सकता है। किन्तु मध्ययुगीन समाज में स्थापित महिला के गौरवपूर्ण स्थान में गिरावट आयी। राजवंषों के काल में बहुपत्नी प्रथा ने उसे उसके स्थान से नीचा किया। मुगल काल में तो महिलाएं केवल उपभोग की वस्तु मात्र बन कर रह गई थी। महिला पर नाना प्रकार के अत्याचार किये जाने लगे। बाल विवाह, सती प्रथा, पर्दा प्रथा, जौहर प्रथा का परम्परागत रूप से प्रचलन और महिला की दषा में गिरावट आने की घटनाएं इसी काल की देन हैं।

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