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Abstract

पुरुष प्रधान भारतीय संस्कृति में स्त्री को निम्न दर्जा होने से उसे दुरूखए यातनाए पीड़ा आदि को चुपचाप सहन करना पड़ा है। यह सच है कि वर्तमान स्त्री घर.परिवार तक ही सीमित नहीं रही है बल्कि पढ़.लिखकर विभिन्न क्षेत्रों में ऊँचे पद की नौकरियाँ कर रही हैं। कुछ स्त्रियाँ अपना उद्योग.व्यवसाय संभाल रही है और कुछ गृह.उद्योग में अपना योगदान दे रही है। इन सभी माध्यमों से भारतीय स्त्री अपना अस्तित्वए अपनी पहचान बनाने में सफल होती दिखाई दे रही है। नागरी जीवन में इस सत्य को नकारा नहीं जा सकता किन्तु ग्रामीण क्षेत्र में परिस्थितियाँ भिन्न दिखाई देती हैं। आज भी ग्रामीण स्त्री अनेक ही समस्याओं से जूझ रही है। कई तरह के मेहनती कार्य उसे करने पड़ते है। ग्रामीण क्षेत्र में आय का एक मात्र साधन खेती होता है। अतरू खेती में उसे मजदूरी तो करनी ही होती हैए साथ ही घर.परिवारए भेड़.बकरियाँए मुर्गियाँ आदि को भी संभालना पड़ता है। उनके भरण.पोषण का ध्यान रखना उसी के जिम्मे होता है। ज्यादातर ग्रामीण पुरुष व्यसनाधीन होने से अपने घर.परिवार की देखभाल भी उसे ही करनी पड़ती है।

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