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Abstract

भक्तियोग इस योग को कहते हैं जो कि प्रेम के माध्यम से मनुष्य तथा ईश्वर को जोड़ने वाला विज्ञान है भक्ति एक ऐसा साधन है जो मानव मन को ईश्वर की ओर उन्मुख कराता है।  पुरातन वैदिक काल से ही लेकर अब तक असंख्य ऋषि तथा मुनियों ने भक्ति से संबंधित अनेक उपदेश दिए हैं तथा इन भक्ति के उद्देश्यों से युक्त उपदेशों के सहस्त्र ग्रंथों की रचना भी की है। भक्ति काल के प्रमुख ग्रंथों में नारदीय भक्ति सूत्र, शांडिल्य भक्ति सूत्र प्रमुख है। ब्रह्मलीन स्वामी वेदांत आनंद जी ने भी भक्ति प्रसंग नामक एक ग्रंथ लिखा है। देवर्षि नारद ने भगवान श्री भगवान के नाम गुण का कीर्तन करते हुए ही अपना संपूर्ण जीवन व्यतीत किया था। नारद भक्ति सूत्र के प्रथम सूत्र में कहा गया है कि भक्ति तत्व का ज्ञान जिज्ञासु भक्त को ही देना चाहिए  क्योंकि ईश्वर की चर्चा करना सभी को अच्छा नहीं लगता अर्थात पात्र देख कर ही उपदेश देना चाहिए तथा भक्ति के अधिकारी के विषय में वर्णन करते हुए कहते हैं कि ज्ञान योग आदि साधना पदों के अधिकारी को शारीरिक, मानसिक आदि गुणों से संपन्न होना आवश्यक होता है किंतु भक्ति मार्ग के लिए केवल आंतरिक व्याकुलता, एकांतिक आग्रह ही आवश्यक है। श्री रामकृष्ण देव अपने भक्तों से कहते हैं कि ’’यहां अन्य कोई नहीं है, इसी से तुम लोगों से कहता हूं आंतरिक भाव से ईश्वर को जो जानना चाहेगा उसे ही वह प्राप्त होगा, निश्चय ही होगा। जो व्याकुल हो ईश्वर के अतिरिक्त और कुछ नहीं चाहता उसे ही प्राप्त होगा।’’ महर्षि शांडिल्य ने कहा भी है आनंद भक्ति में जाति, विद्या, वय, सुन्दरता, लिंग, धन के पक्षपात पर बिना विचार के सब का अधिकार होता है शास्त्रों में इसके असंख्य दृष्टांत भी देखे गए हैं।

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