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Abstract

आयुर्वेद के प्रमुख ग्रंथ चरक सूत्र में स्वास्थय के तीन उपस्तंभों में निद्रा का महत्वपूर्ण स्थान है। निद्रा के संबंध में सुश्रुत का कहना है कि निद्रा का कारण हृदय का तमोभिभूत होना है। अर्थात निद्रा का हेतु तम तथा जागरण का हेतु सतोगुण है। महर्षि पतंजली ने अभाव की प्रतीति कराने वाली वृत्ति को निद्रा कहा हैै। युक्तियुक्त निद्रा जीवनोपयोगी तथा अनिद्राव्याधि स्वरूप होती है। विकृत जीवनचर्या, मांशपेशीय थकावट तनाव, चिंता, आनुवांशिकी तथा अनेक अन्य कारणों से निद्रा में विकृतिया या रोग उत्पन्न हो जाते है। निद्रारोग मानसिक रोगो की श्रेणी में आता है, जिससे व्यक्ति की दिनचर्या प्रभावित होती है। इन रोगों से बचाव तथा उपचार में योग एक उपायभूत साधन है। योग के विभिन्न अभ्यासों के माध्यम से निद्रा संबंधित रोगों का उपचार बिना किसी दुष्प्रभाव के संभव है।

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