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भारत विविधताओं को देश है, जिसमें विभिन्न धर्म, सम्प्रदाय, जाति आदि समुदाय के लोग रहते है। इनमें से आदिवासी भी एक है। जो बृहत्तर भारतीय समाज से पृथक हमेशा प्राकृतिक क्षेत्रों में निवास करते रहे है। उनकी अपनी संस्कृति, भाषा, धर्म, रीति-रिवाज एवं व्यवस्था रही है। सदियों से उनका भूमि, वन और अन्य सेंसाधनों पर नियंत्रण रहा है और वे स्वयं के कानूनों, परम्पराओं और रीति-रिवाजो से शासित रहे है। वे अपना विकास स्वयं करते रहे है। औपनिवेशिक काल के दौरान अग्रेजों का ध्यान आदिवासियों के प्राकृतिक संसाधनों की तरफ गया और उन्होनें अनके प्रकार की नीतिया बनाकर आदिवासियों की प्राकृतिक संपदा का जमकर दोहन किया और जनजातियों के विकास के तरफ कोई ध्यान नही दिया। पृथक्करण की नीति के तहत इनकोे अलग-थलग रखा गया और यह मान लिया गया कि आदिवासी समुदाय अपना विकास स्वयं कर लेगे। आदिवासी विकास से संबंधित इस प्रकार के दृष्टिकोण में परिर्वतन पहली बार स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद देखने को मिला हैं। धर्मनिरपेक्ष एवं समतावादी समाज की स्थापना की उद्देश्य से संविधान का निर्माण किया गया तथा पृथक्करण की नीति को त्यागकर आत्मसातीकरण की नीति को अपनाया गया। आदिवासियों को मुख्यधारा में जोड़नें के लिए संविधान में विभिन्न प्रवधान किये गया। इस शोध पत्र में आदिवासियों की सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक विकास के लिए किये गये संवैधानिक प्रावधानो का विश्लेषण किया गया हैं।

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